






















Petrol-Diesel Price: भारत में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में चुनाव के बाद बड़ा उछाल देखने को मिल सकता है। ब्रोकरेज फर्म Kotak Institutional Equities की रिपोर्ट के मुताबिक, मौजूदा हालात में कीमतों को स्थिर रखना ज्यादा समय तक संभव नहीं है। कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों के बीच तेल कंपनियां लगातार नुकसान झेल रही हैं।
रिपोर्ट के अनुसार, ग्लोबल बाजार में कच्चा तेल करीब 120 डॉलर प्रति बैरल के आसपास बना हुआ है। पश्चिम एशिया में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में सप्लाई बाधित होने से तेल की कीमतों पर दबाव बना हुआ है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार और घरेलू कीमतों के बीच अंतर लगातार बढ़ रहा है।
अभी क्यों नहीं बढ़े दाम?
हाल के हफ्तों में पेट्रोल-डीजल के दाम स्थिर रहे हैं, जिसकी बड़ी वजह जारी चुनाव प्रक्रिया मानी जा रही है। आम तौर पर चुनाव के दौरान सरकारें महंगाई को कंट्रोल रखने की कोशिश करती हैं, ताकि जनता पर सीधा असर न पड़े।
लेकिन इसकी कीमत तेल विपणन कंपनियों (OMCs) को चुकानी पड़ रही है। रिपोर्ट बताती है कि कच्चे तेल के महंगे होने से भारत का आयात बिल रोजाना 190 से 210 मिलियन डॉलर तक बढ़ गया है, जबकि आयात की मात्रा 13-15% तक घटी है। वहीं, कंपनियों पर हर महीने करीब ₹270 अरब का अतिरिक्त बोझ पड़ रहा है।
सरकार ने एक्साइज ड्यूटी में ₹10 प्रति लीटर की कटौती और विंडफॉल टैक्स जैसे कदम उठाए हैं, लेकिन इससे पूरी राहत नहीं मिल पाई है।
चुनाव के बाद क्या होगा?
एक्सपर्ट्स का मानना है कि अप्रैल के अंत में चुनाव प्रक्रिया खत्म होते ही कीमतों में बदलाव शुरू हो सकता है। मौजूदा कच्चे तेल के स्तर को देखते हुए पेट्रोल और डीजल में ₹25-28 प्रति लीटर तक बढ़ोतरी की जरूरत है।
हालांकि, एक बार में इतनी बड़ी बढ़ोतरी की संभावना कम है। कीमतों को धीरे-धीरे बढ़ाया जा सकता है ताकि महंगाई पर ज्यादा असर न पड़े और कंपनियों का घाटा भी कम हो सके।
फिलहाल क्या हैं दाम?
अभी देश के प्रमुख शहरों में कीमतें स्थिर हैं। दिल्ली में पेट्रोल ₹94.77 और डीजल ₹87.67 प्रति लीटर बिक रहा है। मुंबई में पेट्रोल ₹103.49 और डीजल ₹90.03 प्रति लीटर है। बेंगलुरु, हैदराबाद और कोलकाता जैसे शहरों में पेट्रोल ₹100 के ऊपर बना हुआ है।
कीमतें तय कैसे होती हैं?
भारत में ईंधन की कीमतें कई कारकों पर निर्भर करती हैं। इसमें अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल के दाम, रुपये-डॉलर का विनिमय दर, केंद्र और राज्य के टैक्स और ट्रांसपोर्ट लागत शामिल हैं। चूंकि भारत अपनी जरूरत का ज्यादातर तेल आयात करता है, इसलिए वैश्विक कीमतों में बढ़ोतरी का सीधा असर घरेलू बाजार पर पड़ता है।
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