


























पश्चिम बंगाल की राजनीति में बदलाव की बयार जब चलती है, तो वह केवल सत्ता के गलियारों तक सीमित नहीं रहती, बल्कि शहर की दीवारों और झंडों के रंगों को भी रातों-रात बदल देती है। 34 वर्षों तक बंगाल वामपंथ का एक अभेद्य 'लाल किला' बना रहा। कोलकाता के हर कोने में हंसिया और हथौड़े वाले लाल झंडे लहराते थे। शहर के 'एस्प्लेनेड' में साम्यवाद के संस्थापकों- मार्क्स, एंगेल्स और लेनिन की मूर्तियां अपनी चिर-परिचित दृढ़ मुद्रा में खड़ी दिखाई देती थीं, जिन्हें नजरअंदाज करना नामुमकिन था।
साल 2011: जब ढहा था लाल किला
वह 13 मई 2011 का ऐतिहासिक दिन था। बंगाल में वाम मोर्चा सरकार के निर्वाचित होने के लगभग साढ़े तीन दशक बाद, वह सत्ता अचानक ओझल हो गई। वामपंथी दल केवल 40 सीटों पर सिमट गए, जबकि ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस (TMC) ने 184 सीटों के साथ प्रचंड जीत हासिल की।
उस ऐतिहासिक जीत के कुछ ही घंटों के भीतर, इस 'लाल किले' का रंग बदल गया। लाल झंडे गायब हो गए और उनकी जगह शहर तृणमूल के 'जोड़ा घास फूल' वाले तिरंगे झंडों से पट गया। हालांकि, साम्यवादी तिकड़ी (मार्क्स, एंगेल्स, लेनिन) की मूर्तियों को छुआ तक नहीं गया, लेकिन उनकी वह 'उद्देश्यपूर्ण चाल' अब बेमानी लगने लगी थी।
रातों-रात, हर जगह मौजूद पार्टी कार्यालयों से वामपंथी कैडर गायब हो गए, जिससे वे दफ्तर सुनसान और कब्जे के लिए असुरक्षित हो गए। एक साल पहले ही TMC ने कोलकाता नगर निगम (KMC) की कमान संभाल ली थी, और विधानसभा चुनावों में वामपंथियों को मात देने के साथ ही यह बदलाव पूर्ण हो गया था।
साल 2026: एक बार फिर इतिहास ने खुद को दोहराया
अब साल 2026 में आकर ऐसा महसूस होता है मानो 'देजा वू' (अतीत का दोहराव) हो रहा हो। विधानसभा चुनावों में भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने 207 सीटें जीतकर तृणमूल कांग्रेस (TMC) की 80 सीटों को पीछे छोड़ दिया। इसके बाद सोमवार, 4 मई को शहर में जो बदलाव दिखा, वह शायद पिछली बार से भी कहीं अधिक तेज था।
स्थानीय क्लबों, पार्टी कार्यालयों और ऑटो स्टैंडों पर 'जोड़ा घास फूल' की जगह खिलते हुए कमल वाले भाजपा के नारंगी और हरे झंडों ने अकल्पनीय गति से ले ली। मंगलवार तक पूरा कोलकाता पूरी तरह से भगवा रंग में रंग चुका था। तृणमूल के डेढ़ दशक के वर्चस्व के तमाम दृश्य संकेत मानो हवा में विलीन हो गए।
सत्ता परिवर्तन का गहरा असर
हालांकि, इस बार यह बदलाव केवल दिखावे या रंग-रूप तक सीमित नहीं है। इसका तत्काल प्रभाव राजनीतिक पुनर्गठन, प्रशासनिक संकेतों और सार्वजनिक सामंजस्य के रूप में दिखाई दे रहा है। ऑटो किराए और मेट्रो परियोजनाओं से लेकर टॉलीवुड (बंगाली फिल्म इंडस्ट्री) के पावर स्ट्रक्चर और हॉकर नेटवर्क तक, शहर में सत्ता के इस नाटकीय परिवर्तन के परिणाम स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगे हैं।
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