पश्चिम एशिया संकट की समाधान प्रक्रिया जैसे-जैसे लंबी खिंच रही है, लगातार आ रहे नये-नये आर्थिक आंकड़े भारतीय अर्थव्यवस्था की अहम कमजोरियों को सामने ला रहे हैं। इनमें से कई फरवरी के आखिर में यह संकट शुरू होने के पहले से मौजूद थीं और अब जब अर्थव्यवस्था दबाव का सामना कर रही है तो ये स्पष्ट दिखने लगी हैं। आठ मुख्य उद्योगों के सूचकांक संबंधी ताजा आंकड़े दिखाते हैं कि ये सेक्टर कुल मिलाकर मई 2026 में महज 0.5 फीसदी बढ़े, जो 21 महीनों में दूसरा सबसे निचला स्तर है। इसे युद्ध से जुड़े असर के मत्थे मढ़ देना काफी आसान रहा होता, लेकिन आंकड़े यह भी दिखाते हैं कि पूरे वित्त वर्ष 2025-26 के दौरान सूचकांक लगभग उतनी ही मरियल 1.1 फीसदी की दर से बढ़ा। एक चिंता यह बनी हुई है कि घरेलू तेल और प्राकृतिक गैस सेक्टरों में कई सालों से संकुचन का सिलसिला मई में भी जारी रहा। इस समय यानी संघर्ष के तीसरे महीने तक, तेल की कीमतें अप्रैल की चोटी की बनिस्बत कुछ नीचे आ गयी थीं। नतीजतन, घरेलू मांग पूरी करने के लिए तेल विपणन कंपनियों द्वारा तेल आयात एक बार फिर बढ़ने लगा। यहां एक रणनीतिक लक्ष्य से चूकने का सिलसिला जारी है। मांग पूरी करने के लिए आयातित तेल का इस्तेमाल किया जा सकता है, लेकिन फिर भी रणनीतिक रिजर्वों को भरने के लिए घरेलू उत्पादन बढ़ाया जाना चाहिए। यह रिजर्व तेल, कमतर गुणवत्ता का होने पर भी, किल्लत के समय जारी किया जा सकता है। यही बात प्राकृतिक गैस के लिए भी सच है। घरेलू उत्पादन में संकुचन और प्राकृतिक गैस के आयात को देखते हुए, उर्वरक सेक्टर में संकुचन आना स्वाभाविक था। हालांकि, अच्छी खबर यह है कि यह संकुचन – मई 2026 में 0.9 फीसदी का – पूर्व के दो महीनों के मुकाबले काफी कम था। बहरहाल, ‘सुपर अल नीनो’ का उर्वरक की मांग पर क्या असर पड़ेगा, यह अब भी अनिश्चित है।
तकरीबन एक साल में कोयला उत्पादन भी सबसे ज्यादा संकुचित हुआ। जब गर्मियों का तपना जारी है, बिजली उत्पादन को अस्थिर नवीकरणीय स्रोतों या खर्चीले आयातित कोयले पर लगातार ज्यादा निर्भर रहना पड़ेगा। उल्लेखनीय है कि केवल मुख्य सेक्टर ही आर्थिक संकट को उजागर नहीं कर रहे हैं। वस्तु और सेवा कर (जीएसटी) के ताजा राजस्व आंकड़े भी यह दिखा रहे हैं कि घरेलू आर्थिक गतिविधियां धीमी होती लग रही हैं। मई 2026 में घरेलू लेन-देन से राजस्व 2.6 फीसदी संकुचित हुआ। सरकार की दलील है कि ऐसा इसलिए है कि पिछले
साल मई में उसे एकबारगी छप्परफाड़ ट्रांसफर प्राप्त हुआ। इसके बावजूद, पिछले छह महीनों में घरेलू जीएसटी राजस्व में औसत बढ़ोतरी महज 3.1 फीसदी रही, जो वित्त वर्ष 2025-26 और उससे पिछले साल के मुकाबले कम है। यह आपूर्ति का मसला नहीं है, क्योंकि मई 2026 में माल के निर्यात ने रिकॉर्ड ऊंचाई छुई। यह मांग की समस्या है, क्योंकि निम्न वास्तविक वेतन वृद्धि के साथ बढ़ती महंगाई जेब खाली कर रही है। ऐसे समय में जब भारत सामान्य से कम बारिश वाले मानसून में प्रवेश कर रहा है, ये सभी चिंताजनक संकेत हैं। व्यापार समझौते जोरदार सुधारों का विकल्प नहीं बन सकते।
Published - June 24, 2026 10:21 am IST

















