बीते 24 जून को कोलकाता में तारातला वेयरहाउस के ढहने की घटना के मद्देनजर, कथित तौर पर त्रुटिपूर्ण योजना पर आधारित कोई ढांचा खड़ा कर देने का बूता पश्चिम बंगाल के कुख्यात ‘सिंडिकेट राज’ की याद दिलाता है। कोलकाता नगर निगम के मुताबिक, भवन के नक्शे को एक अधिकृत वास्तुकार (आर्किटेक्ट) और संरचना अभियंता (स्ट्रक्चरल इंजीनियर) से प्रमाणित करवाना जरूरी है। लेकिन भ्रष्टाचार कई रूपों में हावी है। मसलन स्थानीय कार्टेल (जिनमें से कुछ को बड़े राजनेताओं का समर्थन हासिल है) कथित तौर पर भवन निर्माताओं (डेवलपर्स) को ज्यादा कीमत पर घटिया निर्माण सामग्री खरीदने के लिए मजबूर करते हैं। वहीं दूसरी ओर, लाइसेंस प्राप्त सर्वेक्षक कथित तौर पर उन डिजाइनों को, जिन्हें उन्होंने खुद तैयार नहीं किया होता, मंजूरी देने का काम बिना लाइसेंस वाले लोगों को सौंप देते हैं। इस वेयरहाउस के ढहने से जुड़ी शुरुआती रिपोर्टों से पता चला है कि ठेकेदार ने कंक्रीट की भारी छत की ढलाई का भार संभालने के लिए नालीदार टिन की चादरों का इस्तेमाल किया था। लागत कम करने के लिए कुछ ठेकेदार अक्सर ऐसा शॉर्टकट अपनाते हैं। इस हादसे में अब तक 11 लोगों की मौत हो चुकी है और कई घायलों की हालत गंभीर है। चश्मदीदों ने अचानक कंपन, तेज आवाज और फर्शों के तेजी से ढहने का जिक्र किया। एक विवरण में तो भारी बारिश के बाद ढहने से घंटों पहले दिखाई देने वाले कंपन की भी सूचना दी गई। भ्रष्टाचार को खत्म करने की कोशिश के तहत पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी ने कोलकाता और उसके आस-पास के इलाकों में तृणमूल कांग्रेस के दौर की सभी परियोजनाओं को रोक दिया है। लेकिन अगर राज्य सरकार अनौपचारिक तरीक़े से उप-ठेकेदार रखने (सब-कॉन्ट्रैक्टिंग) के सिलसिले पर लगाम नहीं लगाती है, तो निर्माण कार्यों की त्रुटिपूर्ण मंजूरियों और गतिविधियों का खामियाजा प्रवासी मजदूरों को ही भुगतना पड़ेगा। लगाम लगाने की यह जरूरत इस बात से भी जुड़ी है कि पर्यावरण के नुकसान के चलते ग्रामीण इलाकों में रोजगार के कई जरिया खत्म हो रहे हैं, लिहाजा देश में समय के साथ प्रवासी मजदूरों की तादाद बढ़ने की उम्मीद है।
इस किस्म की कई संरचनात्मक चूकों में जवाबदेही बिखरी हुई नजर आई है और पिछले कुछ सालों में देश भर में इसी किस्म के दुखद ‘हादसों’ के सिलसिले के मद्देनजर, इस बिखराव पर गंभीरता से विचार करने का अब वक्त आ गया है। इनमें से कुछ नाकामियां शायद प्रशासन के उस पुराने मॉडल का नतीजा रही हों, जो निजी क्षेत्र में आधुनिक निर्माण की रफ्तार और जटिलताओं के साथ कदम मिलाकर चलने में नाकाम रहा है। इस तरह, जवाबदेही में कमी जमीन के मालिकाना हक की वजह से आती है। खासकर तब जब इस मामले में केंद्र और
राज्य के बीच अनिश्चितता हो (जैसा तारातला में हुआ) या फिर कानूनी व्यवस्था उस दौर के हिसाब से बनी हो जब राज्य ही मुख्य निर्माता हुआ करता था। मौजूदा लाइसेंसिंग प्रक्रियाओं में लगातार बरकरार खामियों की वजह से ऐसा संभव है कि पूंजी के असली मालिक निर्माण स्थल पर होने वाले ‘गंदे कामों’ से दूर रहें, सवालिया निशान के घेरे में आने वाले इंजीनियर रोजमर्रा की गड़बड़ियों से नावाकिफ होने का दावा करें और अधिकार-क्षेत्र को लेकर एक-दूसरे पर ज़िम्मेदारी टालन की स्थिति पैदा हो जाए। तारातला से मिली जानकारी के मुताबिक, जब ढांचा गिरा तो वहां कौन-कौन मौजूद था, इसका कोई रिकॉर्ड नहीं है। इस वजह से अधिकारियों को स्थानीय लोगों और परिवारों के विवरणों पर निर्भर रहना पड़ा, जबकि सारा दोष स्थानीय ठेकेदार पर मढ़ा गया। भले ही उसके जिम्मेदार होने की पूरी संभावना है, लेकिन वह तो इस श्रृंखला की बस एक कड़ी भर है।
Published - June 26, 2026 10:32 am IST

























