



















मध्य पूर्व में बढ़ता तनाव अब भारत के बीयर बाजार तक पहुंच गया है। यूरोपीय इंडस्ट्री ग्रुप Federation of European Business in India ने सरकार से अपील की है कि ग्लास बोतल और एल्यूमीनियम कैन पर लगने वाले 10% इंपोर्ट ड्यूटी को अस्थायी तौर पर हटाया जाए। इस ग्रुप में Pernod Ricard, Anheuser-Busch InBev, Heineken और Carlsberg जैसी दिग्गज कंपनियां शामिल हैं।
सप्लाई चेन पर दबाव
बीते 2 अप्रैल को भेजे गए पत्र में कहा गया कि स्थानीय निर्माता पूरी क्षमता पर काम नहीं कर पा रहे हैं। इससे ग्लास बोतल और कैन की सप्लाई सीमित हो गई है, जो अब कंपनियों के लिए बड़ी चुनौती बन रही है।
$65 अरब इंडस्ट्री पर बढ़ता संकट
भारत का करीब $65 अरब का शराब बाजार इस समय दबाव में है। मिडिल ईस्ट संकट के कारण ग्लास, कार्टन और लेबल जैसी पैकेजिंग सामग्री महंगी हो गई है।
समस्या यह भी है कि भारत के लगभग दो-तिहाई राज्यों में कीमत बढ़ाने के लिए सरकारी मंजूरी जरूरी होती है। ऐसे में कंपनियां बढ़ी लागत सीधे ग्राहकों पर नहीं डाल पा रही हैं और खुद नुकसान झेल रही हैं।
इंडस्ट्री पहले ही कच्चे माल की लागत में करीब 15% की बढ़ोतरी झेल रही है। अगर कंपनियां दूसरे देशों से पैकेजिंग मंगाती हैं, तो लागत में 30% तक और इजाफा हो सकता है।
इसीलिए इंडस्ट्री ने सरकार से साफ तौर पर कहा है कि “एल्यूमीनियम कैन और ग्लास बोतलों पर कस्टम ड्यूटी में अस्थायी छूट” दी जाए।
बीयर इंडस्ट्री ने भी उठाई आवाज
Brewers Association of India ने भी सरकार को पत्र लिखकर यही मांग दोहराई है। कई राज्यों में कंपनियां कीमत बढ़ाने की अनुमति मांग चुकी हैं, लेकिन सरकारें फिलहाल मंजूरी देने में हिचक रही हैं।
एसोसिएशन के डायरेक्टर जनरल विनोद गिरी ने कहा, “युद्ध के कारण घरेलू स्तर पर ग्लास बोतल और कैन की सप्लाई काफी घट गई है। मांग पूरी करने के लिए आयात जरूरी हो गया है।”
उन्होंने यह भी जोड़ा कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतें बढ़ने और रुपये की कमजोरी ने भारतीय आयातकों पर अतिरिक्त दबाव डाल दिया है।
सरकार के लिए भी दांव बड़ा
बीयर इंडस्ट्री हर साल करीब $5.52 अरब टैक्स के रूप में देती है। अगर सप्लाई बाधित होती है, तो इसका सीधा असर सरकारी राजस्व पर भी पड़ सकता है।
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