





















India Crude Oil Reserve News: यूएस-इजरायल और ईरान युद्ध के दौरान भारत पर जब कच्चे तेल का संकट आया तो सरकार ने देशवासियों को बताया कि भारत को घबराने की जरूरत नहीं है क्योंकि देश के पास 25 दिन का कच्चे तेल का रिजर्व है। देश के पास इतना बड़ा कच्चे तेल का रिजर्व एकदम से नहीं आया बल्कि इसके पिछले दशकों की मेहनत और रणनीति है।
स्ट्रैटेजिक पेट्रोलियम रिजर्व (SPR) की नींव पश्चिम एशिया के युद्धों खासकर गल्फ वार (Gulf War) और इराक वॉर (Iraq War) के दौरान पड़ी। चलिए जानते हैं भारत के पेट्रोलियम रिजर्व की टाइमलाइन की कब क्या-क्या हुआ?
पी वी नरसिम्हा राव की सरकार
1990 में इराक के कुवैत पर हमले के बाद भारत को बड़ा झटका लगा। तेल की कीमतें तेजी से बढ़ीं और सप्लाई अनिश्चित हो गई। उस समय देश के पास कोई ठोस तेल भंडार नहीं था।
यह संकट पी वी नरसिम्हा राव (P V Narasimha Rao) की सरकार के दौरान चल रहे भुगतान संतुलन संकट के साथ आया। तत्काल प्राथमिकता अर्थव्यवस्था को संभालना था, लेकिन पेट्रोलियम मंत्रालय ने भविष्य के लिए सबक लेना शुरू कर दिया।
वाजपेयी सरकार
1990 के दशक के अंत में अटल बिहारी वाजपेयी (Atal Bihari Vajpayee) की सरकार ने इस विचार को ठोस रूप दिया। उस समय भारत की तेल आयात निर्भरता तेजी से 70% के करीब पहुंच रही थी।
विशेषज्ञ समितियों ने 1998-2000 के बीच भूमिगत भंडारण बनाने की सिफारिश की। इसके बाद सरकार ने स्ट्रैटेजिक पेट्रोलियम रिजर्व की अवधारणा को मंजूरी दी और तटीय क्षेत्रों में स्टोरेज साइट्स की योजना शुरू हुई।
मनमोहन सरकार
मनमोहन सिंह (Manmohan Singh) की सरकार में इस योजना को असली गति मिली। 2004-06 के बीच Phase-I को मंजूरी दी गई और Indian Strategic Petroleum Reserves Limited बनाई गई।
विशाखापट्टनम, मंगलुरु और पदुर में विशाल भूमिगत गुफाएं बनाई गईं। इनकी कुल क्षमता करीब 5.3 मिलियन टन है, जो लगभग 9-10 दिनों की खपत के बराबर है।
मोदी सरकार
नरेंद्र मोदी (Narendra Modi) की सरकार ने इस कार्यक्रम को आगे बढ़ाया। 2020 में तेल की कीमतें गिरने पर भारत ने सस्ते दाम पर बड़े पैमाने पर खरीद कर भंडार भरे। साथ ही Phase-II के तहत चांदीखोल और पदुर विस्तार जैसे नए प्रोजेक्ट मंजूर किए गए, जिससे स्टोरेज क्षमता और बढ़ेगी।
आज क्यों और भी अहम है SPR?
आज भारत अपनी जरूरत का 85% से ज्यादा कच्चा तेल आयात करता है। इसका बड़ा हिस्सा स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से होकर आता है, जो दुनिया के सबसे संवेदनशील समुद्री रास्तों में से एक है। तीन दशक बाद भी सबक वही है कि ऊर्जा सुरक्षा सीधे तौर पर भू-राजनीतिक स्थिरता से जुड़ी है। खाड़ी और इराक युद्धों ने दिखाया कि सप्लाई चेन कितनी जल्दी बाधित हो सकती है।
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