





















सिद्धार्थ जराबी, ग्रुप एडिटर बिजनेस टुडे - संपादकीय
भारतीय अर्थव्यवस्था इस समय एक कठिन दौर से गुजर रही है। पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष, बढ़ती ईंधन कीमतें, सप्लाई को लेकर चिंता और विदेशी पूंजी की निकासी ने रुपये पर दबाव बढ़ा दिया है। इससे वह पॉजिटिव माहौल बदल गया है, जो 1 फरवरी को पेश हुए केंद्रीय बजट के बाद दिखाई दे रहा था। उस समय भारत मजबूत आर्थिक स्थिति और अच्छी ग्रोथ के साथ नए वित्त वर्ष में प्रवेश करता नजर आ रहा था। अगले ही दिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दोनों देशों के बीच अंतरिम व्यापार समझौते का ढांचा भी तय किया था।
लेकिन इसके बाद हालात तेजी से बदले हैं। वेस्ट एशिया युद्ध की लागत पर हमारी सहयोगी सुरभि की रिपोर्ट बताती है कि वैश्विक माहौल कितनी तेजी से बदल गया है। कुछ समय पहले तक भारत को 'गोल्डीलॉक्स' दौर में माना जा रहा था, जहां ग्रोथ मजबूत थी और आर्थिक दबाव नियंत्रित थे। लेकिन अब विदेशी मुद्रा भंडार, बढ़ती महंगाई, चालू खाते के घाटे और कमजोर मानसून जैसी चिंताओं ने स्थिति को ज्यादा संवेदनशील बना दिया है। आयात, ईंधन और कीमती धातुओं को लेकर सरकार के कदम भी इस चुनौती की गंभीरता को दिखाते हैं।
एविएशन सेक्टर इस दबाव को सबसे साफ तरीके से दिखा रहा है। जैसा कि रिचा शर्मा की रिपोर्ट में बताया गया है, भारतीय एयरलाइंस इस गर्मी में भारी मुश्किलों का सामना कर रही हैं। एविएशन टरबाइन फ्यूल की बढ़ती कीमतें, कमजोर रुपया और अंतरराष्ट्रीय यात्रा की धीमी मांग एयरलाइंस की बैलेंस शीट पर दबाव डाल रही हैं। एयरस्पेस प्रतिबंधों के कारण उड़ानों के रूट लंबे हो गए हैं, जिससे ईंधन खर्च और ऑपरेटिंग लागत दोनों बढ़े हैं। विमान लीज और मेंटेनेंस जैसे बड़े खर्च डॉलर में होने की वजह से रुपये की कमजोरी स्थिति को और कठिन बना रही है।
इन हालात से निपटने के लिए एयरलाइंस अंतरराष्ट्रीय उड़ानें घटाकर घरेलू रूट्स पर ज्यादा फोकस कर रही हैं। यात्रियों पर भी इसका असर महंगे किराए के रूप में दिख रहा है। हालांकि सरकार ने कुछ राहत उपायों की घोषणा की है, लेकिन विश्लेषकों का मानना है कि अगर भू-राजनीतिक तनाव लंबे समय तक जारी रहा तो एविएशन सेक्टर में मुश्किलें और बढ़ सकती हैं।
ऐसे माहौल में हमारी कवर स्टोरी Titan Company पर केंद्रित है, जो भारत की सबसे सफल कंपनियों में गिनी जाती है। जैसा कि कृष्णा गोपालन लिखते हैं, टाइटन सिर्फ आंकड़ों की कहानी नहीं है, बल्कि ऐसे बाजारों को पहचानने, भरोसा बनाने और लंबे समय तक रणनीति पर टिके रहने की कहानी है, जहां पहले कम ध्यान दिया गया था। निवेशकों ने इसे बहुत पहले समझ लिया था। दिवंगत निवेशक Rakesh Jhunjhunwala कंपनी के शुरुआती बड़े निवेशकों में शामिल थे और उन्हें इस निवेश से शानदार रिटर्न मिला। आज टाटा समूह के भीतर टाइटन सबसे मूल्यवान कंपनियों में शामिल है और इसके अगले विकास चरण पर सबकी नजर रहेगी।
सिर्फ टाइटन ही नहीं, बल्कि कई भारतीय कंपनियां भी अच्छा प्रदर्शन कर रही हैं। 1,665 कंपनियों के शुरुआती नतीजों के मुताबिक Q4FY26 में इंडिया इंक का नेट प्रॉफिट मार्जिन 12.8% तक पहुंच गया, जो कम से कम पिछले 60 तिमाहियों में सबसे ज्यादा है। कर्मचारियों पर कम खर्च और ब्याज लागत घटने से कंपनियों को कच्चे माल और अन्य खर्चों में बढ़ोतरी का असर संभालने में मदद मिली। यह एक सकारात्मक संकेत जरूर है, लेकिन निजी क्षेत्र के कम निवेश को लेकर सवाल अब भी बने हुए हैं। अब जब पूरी अर्थव्यवस्था बाहरी झटकों से जूझ रही है, तब यह देखना अहम होगा कि कंपनियों का यह प्रदर्शन कितने समय तक टिक पाता है।
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