

















मिडिल ईस्ट में छिड़ा युद्ध अब भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए दोहरी मुसीबत बन गया है। इस संकट ने न केवल विदेशों में काम करने वाले भारतीयों की आजीविका को छीना है, बल्कि देश के निर्यात आधारित उद्योगों की कमर भी तोड़ दी है। आलम यह है कि जो युवा कभी खाड़ी देशों में मोटी कमाई कर रहे थे, वे अब अपने ही वतन में कम वेतन पर काम करने को मजबूर हैं।
कारखानों में पसरा सन्नाटा
रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार उत्तर प्रदेश का औद्योगिक शहर कानपुर इस संकट का सबसे बड़ा केंद्र बनकर उभरा है। चमड़े और स्पोर्ट्स गुड्स के कारोबार से जुड़े 'किंग्स इंटरनेशनल' के मालिक ताज आलम बताते हैं कि युद्ध के कारण शिपिंग और ईंधन की लागत इतनी बढ़ गई है कि मुनाफा खत्म हो गया है।
उनका कारखाना, जो कभी 500 से अधिक लोगों को रोजगार देता था, आज अपनी आधी क्षमता पर सिमट गया है। 'काउंसिल फॉर लेदर एक्सपोर्ट्स' के वाइस चेयरमैन मुख्तारुल अमीन के अनुसार, कानपुर का चमड़ा निर्यात भारत के कुल 6 अरब डॉलर के व्यापार का 25% है। अब बाजार में अनिश्चितता इतनी है कि कंपनियां नई भर्तियां करने से डर रही हैं।
₹30 हजार की नौकरी छोड़ अब चाय की दुकान पर कर रहे काम
कानपुर के ही 32 वर्षीय मोहम्मद कुरैशी इस दर्द की मिसाल हैं। सऊदी अरब की एक ज्वेलरी शॉप में 30,000 रुपये कमाने वाले कुरैशी आज वापस लौटकर चाय की दुकान पर महज 10,000 रुपये में काम कर रहे हैं। वह कहते हैं कि सऊदी में उनकी जिंदगी आसान थी, लेकिन युद्ध ने उनके सपने तोड़ दिए।
खाड़ी देशों से लौट रहे कामगार
वर्ल्ड बैंक के अनुसार, खाड़ी क्षेत्र की आर्थिक विकास दर 2026 में घटकर 1.3% रह सकती है, जिसका सीधा असर वहां कार्यरत 90 लाख भारतीयों पर पड़ा है। 28 फरवरी से अप्रैल के अंत तक करीब 11 लाख भारतीय कामगार वापस वतन लौट चुके हैं।
केरल के थॉमस चेरियन ने 18 साल सऊदी की एक कंस्ट्रक्शन फर्म में गुजारे, लेकिन अब प्रोजेक्ट बंद होने से उनकी नौकरी चली गई है। नोर्का रूट्स (NORKA Roots) के सीईओ अजीत कोलास्सेरी के मुताबिक, यदि यह संघर्ष लंबा खिंचा, तो केरल का जॉब मार्केट ठप हो सकता है।
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