




















दिल्ली जीम खाना क्लब ने ब्रिटिश साम्राज्य का पतन देखा और जवाहरलाल नेहरु से अब तक कई प्रधानमंत्री आते-जाते देखे। आधुनिक भारत के जन्म का गवाह ये क्लब एक सदी से भी अधिक समय तक भारत के सत्ताधारी ब्यूरोक्रेट्स, जजों और सेना के बड़े अफसरों का एक अटूट किला बना रहा- आज लुटियंस दिल्ली का यह ऐतिहासिक अध्याय हमेशा के लिए बंद होने के कगार पर है।
केंद्र सरकार ने अचानक दिल्ली जिमखाना क्लब को आगामी 5 जून तक अपनी पूरी 27 एकड़ की संपत्ति सरकार को सौंपने का आदेश दिया है। आखिर क्यों केंद्र सरकार क्लब की जमीन को लेने पर आतुर है।
सुरक्षा और रक्षा बुनियादी ढांचे का हवाला
भूमि और विकास कार्यालय (Land and Development Office) ने जिमखाना क्लब की लीज को तत्काल प्रभाव से रद्द कर दिया है। सरकार का कहना है कि लोक कल्याण मार्ग स्थित प्रधानमंत्री आवास से सटी इस जमीन की सार्वजनिक सुरक्षा और रक्षा बुनियादी ढांचे के लिए तत्काल आवश्यकता है। इसलिए यह संपत्ति अब सरकार के अधीन होगी।
इस आदेश के बाद क्लब के भीतर खलबली मच गयी है। यहां काम करने वाले कर्मचारियों और उनके परिवारों पर संकट गहरा गया है। यहीं वजह है कि क्लब के भीतर हड़कंप और विरोध का माहौल गर्मा गया है। जीम खाना क्लब की गवर्निंग कमेटी ने एक आपातकालीन बैठक बुलाई है और केंद्र सरकार से तुरंत बातचीत की मांग की है।
इस फैसले का सबसे बड़ा और सीधा असर वहां काम करने वाले लोगों पर पड़ने जा रहा है:
कर्मचारियों की संख्या: विभिन्न मीडिया रिपोर्ट्स और क्लब के रिकॉर्ड्स के अनुसार, दिल्ली जिमखाना क्लब में करीब 600 स्थायी और अस्थायी कर्मचारी है, इनमें केटरिंग स्टाफ, ग्राउंड्समैन, एडमिनिस्ट्रेशन और हाउसकीपिंग के लोग शामिल हैं।
परिवारों पर संकट: यदि 5 जून को क्लब पूरी तरह बंद या विस्थापित होता है, तो सीधे तौर पर इन कर्मचारियों के परिवारों के लगभग 1,500 से 2,000 लोगों के जीवन और आजीविका पर गहरा संकट मंडराने लगेगा। अचानक आई इस बेदखली से कर्मचारियों में अपने रोजगार को लेकर भारी चिंता जतायी है।
सुरक्षा पर ऐतिहासिक सवाल: पहले क्यों नहीं उठी बात?
सरकार ने इस जमीन को खाली कराने के पीछे 'प्रधानमंत्री आवास की सुरक्षा' को मुख्य कारण बताया है। लेकिन इस तर्क ने एक नई बहस को जन्म दे दिया है। दिल्ली जिमखाना क्लब 1913 में बना था, जबकि 7 लोक कल्याण मार्ग (पहले रेसकोर्स रोड) पर स्थित प्रधानमंत्री आवास की शुरुआत 1980 के दशक में हुई थी। यहां राजीव गांधी, वी.पी. सिंह, पी.वी. नरसिम्हा राव, अटल बिहारी वाजपेयी और डॉ. मनमोहन सिंह जैसे देश के कई दिग्गज प्रधानमंत्री ने निवास किया। दशकों के इस इतिहास में पहले कभी भी किसी सरकार या सुरक्षा एजेंसी ने जिमखाना क्लब की मौजूदगी को प्रधानमंत्री की सुरक्षा के लिए खतरा नहीं बताया और न ही इस पर कोई सवाल उठाए। यही कारण है कि इस अचानक की गई कार्रवाई पर लोग हैरान हैं।
इतिहास और विरासत का प्रतीक
साल 1913 में 'इम्पीरियल दिल्ली जिमखाना क्लब' के रूप में स्थापित यह संस्थान भारत के सबसे पुराने और सबसे विशिष्ट क्लबों में से एक है। वास्तुकला के लिहाज़ से भी इसकी अहमियत है। इसे प्रसिद्ध ब्रिटिश वास्तुकार रॉबर्ट टी. रसेल ने डिजाइन किया था, जिन्होंने कनॉट प्लेस और तीन मूर्ति हाउस जैसी ऐतिहासिक इमारतें बनाई थीं। अपनी औपनिवेशिक वास्तुकला और विशाल हरे-भरे मैदानों के साथ, जिमखाना लंबे समय से भारत के टॉप क्लास नौकरशाहों, राजनयिकों और सैन्य दिग्गजों का पसंदीदा सोशल हब रहा है। इसकी सदस्यता की वेटिंग लिस्ट इतनी लंबी है कि लोगों को दशकों तक इंतजार करना पड़ता है।
सुलगने लगी सियासत
क्लब के अंदर-बाहर अब इस मुद्दे पर राजनीति गरमा गई है। विपक्ष ने केंद्र सरकार पर तानाशाही रवैया अपनाने, ऐतिहासिक विरासत को बिना किसी विचार-विमर्श के नष्ट करने का आरोप लगाया है। कुछ लोगों और कानूनी जानकारों के लिए, यह सरकार द्वारा राष्ट्रीय सुरक्षा के मद्देनजर अपनी सबसे कीमती जमीन को वापस लेने का एक वैध प्रशासनिक कदम है। तो वहीं दूसरी तरफ, एतिहासिक दिल्ली को करीब से जानने वालों के लिए, यह इतिहास और उसकी एक जीवंत विरासत को हमेशा के लिए मिटा देने वाला कदम है।
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