


















सिद्धार्थ जराबी, ग्रुप एडिटर बिजनेस टुडे - संपादकीय
पश्चिम एशिया (West Asia) में युद्धविराम होने से पूरी दुनिया ने राहत की सांस ली है। पिछले कुछ समय से युद्ध, अनिश्चितता और सप्लाई चेन में रुकावटों के कारण ग्लोबल अर्थव्यवस्था दबाव में थी। अब कच्चे तेल (Crude Oil) की कीमतों में नरमी आई है, फर्टिलाइजर्स की उपलब्धता को लेकर चिंताएं कम होने की उम्मीद है और शेयर बाजार भी इस खबर से उत्साहित दिखाई दे रहा है। लेकिन भारत को यह मानकर नहीं चलना चाहिए कि सारी समस्याएं खत्म हो गई हैं।
इस पूरे संकट ने एक बार फिर दिखाया है कि भारत आज भी बाहरी देशों और वैश्विक घटनाओं पर काफी हद तक निर्भर है। दुनिया की सबसे बड़ी आबादी वाला देश होने के बावजूद हमारी अर्थव्यवस्था कई मामलों में बाहरी झटकों से प्रभावित हो सकती है।
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ऐसा पहली बार नहीं हुआ है। 1973 के यॉम किप्पुर युद्ध और 1990 के खाड़ी युद्ध (Gulf War) के दौरान भी तेल की कीमतों में भारी उछाल आया था, जिससे आयात पर निर्भर देशों को बड़ा नुकसान हुआ था। हालांकि 1991 के आर्थिक संकट के दौरान तत्कालीन प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिम्हा राव की सरकार ने बड़े आर्थिक सुधार किए और संकट को अवसर में बदल दिया। आज की स्थिति भी भारत के लिए वैसा ही मौका लेकर आई है।
पिछले एक दशक में भारत के आयात का स्वरूप काफी बदल गया है। वित्त वर्ष 2014 में भारत का कुल आयात 449 अरब डॉलर था, जो बढ़कर वित्त वर्ष 2026 में 776 अरब डॉलर तक पहुंच गया। पेट्रोलियम अभी भी सबसे बड़ा आयातित उत्पाद है, लेकिन कुल आयात में इसकी हिस्सेदारी कम हुई है। दूसरी तरफ गैर-तेल (Non-Oil) आयात कहीं ज्यादा तेजी से बढ़े हैं। इसका मतलब है कि देश में खपत बढ़ रही है, लेकिन इसके साथ यह भी साफ हो रहा है कि अब लगभग हर सेक्टर किसी न किसी रूप में आयात पर निर्भर हो चुका है।
सबसे बड़ी चिंता चीन को लेकर है। भारत के आयात का बड़ा हिस्सा चीन से आता है। अगर चीन किसी कारण से खनिज, मशीनरी या अन्य जरूरी सामान की सप्लाई रोक देता है, तो ऑटोमोबाइल, सोलर सेल, इलेक्ट्रॉनिक्स और कई अन्य उद्योगों का उत्पादन प्रभावित हो सकता है। खासकर क्रिटिकल मिनरल्स (Critical Minerals) के मामले में आने वाले वर्षों में यह निर्भरता और बढ़ सकती है।
खाद्य सुरक्षा भी एक अहम मुद्दा बनती जा रही है। भारत खाद्य तेल, दालों और उर्वरकों के आयात पर लगातार ज्यादा निर्भर होता जा रहा है। यदि वैश्विक स्तर पर सप्लाई बाधित होती है तो इसका सीधा असर आम लोगों की थाली पर पड़ सकता है।
सोने का मामला भी अलग नहीं है। भारत में सोने की मांग बहुत ज्यादा है। अनिश्चित समय में लोग इसे सुरक्षित निवेश मानते हैं, लेकिन बड़े पैमाने पर सोने का आयात रुपये पर दबाव बढ़ाता है और देश के चालू खाते (Current Account) को भी प्रभावित करता है। यही वजह है कि समय-समय पर सरकार लोगों से सोने की खरीदारी सीमित रखने की अपील करती रही है।
सेमीकंडक्टर और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जैसे आधुनिक क्षेत्रों में भी भारत अभी पूरी तरह आत्मनिर्भर नहीं है। देश अपना चिप इकोसिस्टम बनाने की कोशिश कर रहा है, लेकिन इसके लिए जरूरी मशीनें और तकनीक अभी भी विदेशों से आती हैं। हाल ही में Anthropic के एडवांस्ड AI मॉडल पर लगी कुछ पाबंदियों ने यह भी दिखाया कि तकनीक के क्षेत्र में भी बाहरी देशों पर निर्भरता कारोबार के लिए जोखिम पैदा कर सकती है।
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ऐसे में भारत को सिर्फ छोटे-छोटे सुधारों से आगे बढ़कर बड़े कदम उठाने होंगे। घरेलू उत्पादन क्षमता बढ़ानी होगी, रिसर्च और इनोवेशन में निवेश बढ़ाना होगा और उद्योगों को अधिक स्वतंत्र एवं प्रतिस्पर्धी बनाना होगा। इसका मतलब यह नहीं है कि भारत पूरी तरह स्वदेशी मॉडल अपनाए या आयात बंद कर दे। किसी भी बड़ी अर्थव्यवस्था के लिए यह संभव नहीं है।
असल जरूरत यह है कि स्वस्थ व्यापार और खतरनाक निर्भरता के बीच अंतर समझा जाए। व्यापार जरूरी है, लेकिन किसी एक देश या सीमित स्रोतों पर अत्यधिक निर्भरता जोखिम पैदा करती है। हाल के वैश्विक संघर्षों ने यह साफ कर दिया है कि भूगोल (Geography) भी एक आर्थिक जोखिम बन सकता है।
वर्तमान समय भारत के लिए एक महत्वपूर्ण अवसर है। केंद्र सरकार के पास मजबूत राजनीतिक समर्थन है और यदि सही नीतिगत फैसले लिए जाएं तो देश अपनी आर्थिक सुरक्षा को और मजबूत बना सकता है तथा भविष्य के वैश्विक संकटों का बेहतर तरीके से सामना कर सकता है।
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