

























Hidden Expenses: जब हम अपने खर्चों का हिसाब लगाते हैं, तो आमतौर पर हमारा ध्यान घर के किराए, बैंक की ईएमआई और राशन के बिल पर ही जाता है। लेकिन असल में आपकी मेहनत की कमाई को चुपचाप खत्म करने वाले विलेन कुछ और ही हैं। ये छोटे और बार-बार होने वाले खर्च जैसे ओटीटी सब्सक्रिप्शन, प्लेटफॉर्म फीस और छिपे हुए टैक्स हैं, जिन पर हमारा ध्यान ही नहीं जाता।
व्यक्तिगत तौर पर ये खर्चे बहुत मामूली लगते हैं, लेकिन निवेश सलाहकार फर्म 'इक्वेंटिस' के मुताबिक, ये आपकी जेब से हर महीने 5,000 से 15,000 रुपये तक निकाल लेते हैं। साल भर का हिसाब लगाएं तो यह आंकड़ा 1 लाख रुपये के पार पहुंच जाता है। चलिए जानते हैं उन फैक्टर्स के बारे में जो आपकी कमाई को कम कर रही हैं।
सब्सक्रिप्शन का जाल
आज के दौर में शहरी लोगों की जिंदगी पूरी तरह सब्सक्रिप्शन पर टिकी है। इसमें फिल्में देखने के प्लेटफॉर्म, क्लाउड स्टोरेज, फिटनेस ऐप और म्यूजिक स्ट्रीमिंग शामिल हैं। असली समस्या इन सर्विस का इस्तेमाल नहीं, बल्कि हमारी लापरवाही है।
अक्सर फ्री ट्रायल खत्म होने के बाद वे खुद-ब-खुद पेड प्लान में बदल जाते हैं और हम उन्हें बंद करना भूल जाते हैं। एक 299 रुपये का मंथली प्लान सुनने में छोटा लगता है, लेकिन साल भर में यह 35,000 रुपये से ज्यादा का बोझ बन जाता है।
ऐसी 5-8 सर्विस मिलकर आपकी बचत को कम करती हैं। कई कंपनियां तो जानबूझकर सब्सक्रिप्शन कैंसल करने की प्रक्रिया को इतना कठिन बना देती हैं कि यूजर हार मानकर पेमेंट जारी रखता है।
छिपे हुए छोटे खर्चे
सब्सक्रिप्शन के अलावा 'ट्रांजैक्शनल फ्रिक्शन' यानी लेन-देन के दौरान लगने वाली फीस भी जेब ढीली कर रही है। इक्वेंटिस की रिपोर्ट बताती है कि स्विगी या जोमैटो से खाना मंगाने पर हर ऑर्डर के साथ 30 से 60 रुपये प्लेटफॉर्म या सर्विस फीस के नाम पर जुड़ जाते हैं।
इसी तरह, एटीएम से तय सीमा से ज्यादा पैसे निकालने पर 20 रुपये प्रति ट्रांजैक्शन और बैंक द्वारा एसएमएस अलर्ट या मिनिमम बैलेंस के नाम पर वसूले जाने वाले चार्ज भी धीरे-धीरे बड़ी रकम बन जाते हैं।
अगर आप हफ्ते में सिर्फ 200 रुपये भी इन फीस को दे रहे हैं, तो साल के अंत तक आप बिना किसी फायदे के 10,000 रुपये गंवा चुके होते हैं। कार्ड पर लगे ऑटो-डेबिट के कारण हमें पैसे कटने का अहसास भी नहीं होता।
टैक्स और पेनल्टी का बोझ
डिजिटल ट्रांजैक्शन और वित्तीय सेवाओं पर लगने वाला 18 प्रतिशत जीएसटी भी एक 'साइलेंट आउटफ्लो' है। जब यह कई सेवाओं पर बार-बार लगता है, तो आपकी कुल लागत बढ़ जाती है। इसके अलावा क्रेडिट कार्ड पेमेंट में देरी होने पर लगने वाली लेट फीस और उस पर 30-40 प्रतिशत का भारी ब्याज आपकी छोटी सी गलती को बहुत महंगा बना देता है। फ्लैश सेल और सीमित समय के ऑफर्स के लालच में आकर किए गए 199 या 500 रुपये के छोटे खर्च भी बजट को बिगाड़ देते हैं।
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